कमला हैरिस के अलावे 20 अन्य बाइडेन सरकार में शामिल,  भारत का अमरीका में बढ़ाया मान: शिवानन्द तिवारी

कमला हैरिस के अलावे 20 अन्य बाइडेन सरकार में शामिल, भारत का अमरीका में बढ़ाया मान: शिवानन्द तिवारी

कमला हैरिस के अलावे 20 अन्य भारतीय मूल के अमरीकी सदन में होंगे बाइडेन के सहयोगी: शिवानन्द तिवारी

भारतीय मूल की कमला देवी हैरिस अमेरिका की उप-राष्ट्रपति बन गईं. कमला देवी अमेरिका के इतिहास में उप-राष्ट्रपति बनने वाली पहली महिला बन गईं हैं. अमेरिका के इतिहास में उपराष्ट्रपति बनने वाली पहली ‘ब्लैक’ उपराष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने रेकाड बनाया है. अमेरिका में हमारे यहाँ के लोगों को या ग़ैर गोरों को ब्लैक ही माना जाता है. भले ही हमारे देश के गौरवर्णिय अपने आपको कितना भी श्रेष्ठ क्यों न समझते हों ! कमला जी के अलावा भारतीय मूल के लगभग 20 लोग भी राष्ट्रपति बाइडेन के प्रशासन के महत्वपूर्ण स्थानों पर पदस्थापित किए गए हैं. यह हमारे लिए गर्व की बात है.
सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं कई मुल्कों में भारतीय मूल के लोग वहाँ की सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इंग्लैंड में ही वहाँ के वित् मंत्री, ऋषि सुनक इंफ़ोसिस के नारायण मूर्ति जी के दामाद हैं. इंग्लैंड में प्रधानमंत्री के बाद वित्त मंत्री ही दूसरे नम्बर का मंत्री माना जाता है. लेकिन अमेरिका हो या इंग्लैंड, किसी भी देश में उनके भारतीय मूल को लेकर उनकी देश भक्ति पर किसी ने संदेह ज़ाहिर नहीं किया.
लेकिन हमारे देश में दूसरे तरह की एक विचारधारा बहुत मज़बूत है. बल्कि इसी विचारधारा को मानने वालों के हाथ में ही आज़ हमारे देश की सरकार है. यह विचारधारा देश की नागरिकता को अलग ढंग से परिभाषित करती है. इनका मानना है कि जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि भारत में ही है, वे यहाँ के एक नम्बर के नागरिक हैं. लेकिन जिनकी पितृभूमि तो यहाँ है लेकिन पुण्य भूमि देश के बाहर है, ऐसे लोगों को यहाँ का एक नंबर का नागरिक नहीं माना जाएगा. हमारे देश में दो धर्मावलंबी ऐसे हैं जिनकी पितृभूमि तो इस देश में है, लेकिन उनकी पुण्यभूमि यानी उनका तीर्थस्थान देश के बाहर है. ये हैं मुसलमान और ईसाई. इन दोनों का तीर्थस्थान देश के बाहर है. मुसलमानों का मक्का और मदीना है. दोनों सऊदी अरब में अवस्थित हैं. इसी प्रकार इशाईयों का तीर्थ स्थान येरूशेलम में है. इसलिए यह विचार धारा इन दोनों धर्मावलंबियों को देश का एक नम्बर का नागरिक नहीं मानती है. इनकी देशभक्ति इस विचार धारा को मानने वालों की नज़रों में हमेशा संदिग्ध रहेगी. इन दोनों धर्मावलंबियों को की आबादी हमारे देश में लगभग 25 करोड़ होगी.
इस आधार पर देखा जाए तो कमला देवी और बिदेन सरकार के प्रशासन मे नियुक्त लगभग बीस लोग भारतीय मूल के हैं और उनका तीर्थस्थान भारत वर्ष में है. वहीं इंग्लैंड के वित्त मंत्री ऋषि सुनक के विषय में भी कहा जा सकता है. लेकिन इनलोगों के भारतीय मूल होने और इनकी पुण्य भूमि वहाँ नहीं होने के बावजूद, जिन देशों में वे रह रहे हैं वहाँ उस देश के प्रति उनकी निष्ठा और भक्ति पर कभी किसी ने उँगली नहीं उठायी है. बल्कि उन पर पूर्ण विश्वास करते हुए उन्हें देश की महत्वपूर्ण प्रशासनिक ज़िम्मेदारी दी गई है.
एक बात और ग़ौर करने लायक है. बौद्ध धर्म की उत्पत्ति तो भारत वर्ष में ही हुई थी. लेकिन दुर्भाग्य है कि बौद्ध धर्म हमारे देश से लगभग लुप्त ही हो गया था. अंग्रेजों के ज़माने में ही उन्हीं के द्वारा बौद्ध धर्म की हमारे देश में वापसी हुई. अंग्रेजों ने न सिर्फ़ हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथों की खोज की बल्कि बौद्ध धर्म से संबंधित साहित्य का भी उन्होंने ही पुनरुद्धार किया. भले ही भारत वर्ष में बौद्ध धर्म को मानने वालों की संख्या अत्यंत सीमित हो, लेकिन कई देशों का धर्म बौद्ध है. जैसे भूटान,कोरिया, जापान या थोड़ा बहुत चीन. इनके अलावा कई मुल्कों में ऐसे लोग हैं जो बुद्ध को ही अपने धर्मगुरू के रूप में देखते और मानते हैं. इन सब लोगों की पुण्यभूमि भारत है. लेकिन इन मुल्कों में कभी यह सवाल नहीं उठा कि इनकी पुण्यभूमि देश के बाहर है इसलिए इनलोगों की देश के प्रति भक्ति या निष्ठा कमज़ोर है.
इसलिए जो लोग पितृभूमि के साथ-साथ पुण्यभूमि को भी नागरिकता का या देश भक्ति का आधार मानते हैं वे हमारे देश को न सिर्फ़ सीमित करना चाहते हैं बल्कि उसे खंडित करने का प्रयास भी कर रहे हैं.

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