भारत की पहली नागरिक स्नेहा, जिन्होंने क़ानूनी तौर पर ‘नो कॉस्ट नो रिलीजन’ का प्राप्त किया सर्टिफिकेट

भारत की पहली नागरिक स्नेहा, जिन्होंने क़ानूनी तौर पर ‘नो कॉस्ट नो रिलीजन’ का प्राप्त किया सर्टिफिकेट

-अजय खरे
तमिलनाडु के वेल्लूर जिले की एम ए स्नेहा तिरूपत्तूर की रहने वाली हैं जहां बतौर वकील प्रैक्टिस कर रही हैं . स्नेहा भारत की पहली ऐसी नागरिक हो गई हैं जिन्होंने क़ानूनी तौर पर धर्म और जाति विहीन ( नो कॉस्ट नो रिलीजन) होने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया है। इसके लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। स्नेहा ने एक ऐसा काम कर दिखाया है जो पूरे देश में किसी ने नहीं किया था . अब सरकारी दस्तावेज़ों में इन्हें जाति बताने या उसका प्रमाण पत्र लगाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी . 5 फरवरी 2019 को तिरुपत्तूर के तहसीलदार टीएस सत्यमूर्ति ने स्नेहा को ‘नो कास्ट- नो रिलिजन’ सर्टिफिकेट सौंपा था . स्नेहा इस कदम को एक सामाजिक बदलाव के तौर पर देखती हैं. यहां तक वहां के अधिकारियों का भी कहना है कि उन्होंने इस तरह का सर्टिफिकेट पहली बार बनाया है . स्नेहा और उनके माता-पिता हमेशा से किसी भी आवेदन पत्र में जाति और धर्म का कॉलम खाली छोड़ते थे. उनका कहना है कि मनुष्य होने के नाते हम ब्रह्मांड की सर्वाधिक विकसित प्रजाति हैं तो फिर हमें जाति और धर्म की क्या जरूरत ?

स्नेहा ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके परिवार में उनके अलावा उनके माता-पिता और तीन बहनें हैं. स्नेहा के माता-पिता समेत उनकी सभी बहनें भी पेशे से वकील हैं. उनके माता-पिता ने अपनी तीनों बेटियों का नाम स्नेहा, मुमताज और जेनिफर रखा जिससे जाति या धर्म की पहचान न हो सके.
उन्होंने बताया कि उनके बर्थ सर्टिफिकेट से लेकर स्कूल के सभी प्रमाण पत्रों में जाति और धर्म का कॉलम खाली हैं. इन सभी में उन्होंने खुद को सिर्फ भारतीय लिखा हुआ है. स्नेहा ने बताया कि जो भी फॉर्म वह भरती हैं उसमें जाति प्रमाण पत्र देना ज़रूरी होता है. ऐसे में उन्हें सेल्फ एफिडेविट लगाना पड़ता. स्नेहा ने कहा कि जो लोग जाति धर्म मानते हैं उन्हें जाति प्रमाण पत्र दे दिया जाता है तो मेरे जैसे लोग जो ये नहीं मानते उन्हें प्रमाण पत्र क्यों नहीं दिया जा सकता.


बता दें स्नेहा ने इस सर्टिफिकेट के लिए 2010 में अप्लाई किया था लेकिन अधिकारी उनके आवेदन को टाल रहे थे. लेकिन 2017 में उन्होंने अधिकारियों के सामने अपना पक्ष रखना शुरू किया . स्नेहा ने कहा कि तिरुपत्तूर की सब-कलेक्टर बी प्रियंका पंकजम ने सबसे पहले इसे हरी झंडी दी. इसके लिए उनके स्कूल के सभी दस्तावेज़ खंगाले गए जिनमें किसी में भी उनका जाति-धर्म नहीं लगा था.
स्नेहा के पति के प्रतिभा राजा पेशे से तमिल प्रोफेसर हैं. ये दोनों अपनी तीनों बच्चियों के भी सभी स्कूल सर्टिफिकेट में जाति और धर्म की जगह खाली छोड़ते हैं. यहां तक कि उनकी बेटियों के नाम भी दो धर्मों के कॉम्बिनेशन से बने हुए हैं; अधिरई नसरीन, अधिला इरीन, आरिफा जैसी. जाति और धर्म के कटघरे से ऊपर उठकर मनुष्य के रूप में अपनी कानूनी पहचान दर्ज कराने वाली स्नेहा उनके माता-पिता और पति प्रतिभा राजा सच में बधाई के पात्र हैं।

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