सृष्टिकर्ता की अस्थि से बनी थी कायस्थ की काया

सृष्टिकर्ता की अस्थि से बनी थी कायस्थ की काया

  • डॉ.भास्कर मिश्रा की प्रस्तुति

बात उन दिनों की है ,जब धर्मराज के पास हम मनुष्यों का लेखा जोखा तैयार करने के लिए शायद कम्प्यूटर नहीं था. उन्हें इस कार्य के लिए एड़ी का पसीना चोटी तक एक करना पड़ता था. धर्मराज ने अपनी यह परेशानी ब्रह्माजी को बतायी . ब्रह्माजी ने अपनी अस्थि से एक कायस्थ पैदा कर दिया . उसका नाम उन्होंने चित्रगुप्त रखा. ब्रह्मा में यह चित्र गुप्त तरीके से व्याप्त था ,शायद इसी कारण चित्रगुप्त नाम रखा गया . उन दिनों मर्त्य लोक या किसी अन्य लोक में दो शादियां करने पर कोई बैन नहीं था. इसलिए चित्रगुप्त ने दो शादियां कीं . पहली पत्नी का नाम सूर्यदक्षिणा (नंदिनी ) और दूसरी का नाम ऐरावती (शोभावती ) था . नंदिनी से चार व शोभावती से आठ संतानें हुईं .

कुल मिलाकर चित्रगुप्त के बारह संतानें हुईं . ये बारह संतानें हीं कालांतर में बारह गोत्रीय कायस्थ बने. आज भी ये गोत्र अस्थाना , श्रीवास्तव , खरे , सक्सेना , सिन्हा ,माथुर , निगम , गौड़, भटनागर व लाल के रूप में मौजूद हैं .दक्षिण भारत में ये लोग मुदलियार, पिल्लै , नायडू ,रेड्डी व नायर के रुप में मौजूद हैं . चूंकि ये ब्रह्मा की अस्थि से पैदा हुए थे , इसलिए कुछ लोग इन्हें पांचवां वर्ण भी मानते हैं.

कुछ लोग कायस्थों का आविर्भाव काल गुप्त काल से मानते हैं. गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण काल माना जाता है ,जिसमें कायस्थों का योगदान सर्वोपरि है . कायस्थों ने वित्त का लेखा जोखा सम्भाला . पाई पाई का हिसाब रखा . तब जाकर कहीं गुप्त काल में भारत का सर्वांगीड़ विकास हो पाया . कुछेक का मत है कि लिखने की कला का विकास ईशा पूर्व 600/300 हुआ . ब्राह्मणों को अनुष्ठान और पूजा पाठ से फुर्सत नहीं थी . इसलिए लिखने लिखाने , अभिलेख बनाने का काम कायस्थों ने अपना लिया . उन्होंने समय समय पर संस्कृत , पालि , अरबी, फारसी , उर्दू , अंग्रेजी सीखी और हमेशा प्रशासन से जुड़े रहे . जब कायस्थों ने खुद के आरक्षण का मसला कोर्ट में उठाया तो कोर्ट ने उनकी अपील को रद्द कर दी. कोर्ट का कहना था कि जब बगैर आरक्षण के उनकी पैठ प्रशासन में इतनी गहरी है तो आरक्षण दे देने पर तो किसी और जाति को मौका हीं नहीं मिलेगा .

कायस्थों की बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण हुआ करती थी . कश्मीर के राजा से उसके अंग्रेज फेमिली डाक्टर ने 11 एकड़ जमीन दान में मांगी थी . राजा ने तत्क्षण हीं स्वीकृति दे दी ,पर उनके मुनीम ने शर्त लगा दी कि वह जमीन पांपोर इलाके की नहीं होगी .पांमपोर (पद्मपुर) में उन दिनों 11 एकड़ जमीन में केसर की खेती होती थी . इस प्रकार उस कायस्थ मुनीम ने अंग्रेज की पांमपोर की केसर युक्त जमीन को हड़पने की मंशा पर पानी फेर दिया .

कायस्थों का एक समय में आधे भारत पर शासन था .कश्मीर में बर्द्धन वंश , काबुल व पंजाब में जयपाल वंश , गुजरात में बल्लभ वंश , दक्षिण में चालुक्य वंश , उत्तर भारत के गौड़ वंश , मध्य भारत के सतवाहन व परिहार वंश , बंगाल में पाॅल व सेन वंश आदि ने सफलता पूर्वक शासन किया था .

सन् 1765 में उड़ीसा व बिहार के संयुक्त दीवान बने सिताब राय ने भी अच्छा शासन चलाया था . अब तो समाज का कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं रहा . राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद , नेताजी सुभाष चंद्र बोस , प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री , समाज सेवक व स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण, इतिहासकार जदुनाथ सरकार व बनारसी प्रसाद सक्सेना , क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी , विपिन चंद्रपाल , खुदी राम बोस , रास बिहारी घोष ; कवि -महादेवी वर्मा, फिराक गोरखपुरी ,हरिवंश राय बच्चन , गोपाल दास नीरज ; विश्व प्रसिद्ध विद्वान स्वामी विवेकानंद , प्रसिद्ध समाज सुधारक राजा राम मोहन राय , उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेम चंद , महान साईंसदान आचार्य जगदीश चंद्र बसु , मेगा स्टार अमिताभ बच्चन , प्रसिद्ध खलनायक व बाद के दिनों के नायक व वर्तमान में राजनीतिकार शत्रुघ्न सिन्हा , कुख्यात ठग नटवर लाल आदि सभी कायस्थ कुल में उत्पन्न लोग थे , जिन्होंने इतिहास रचा है . इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द करने वाले प्रसिद्ध न्यायधीश जगमोहन लाल भी कायस्थ थे. अकबर के नव रत्नों में से एक राजा टोडरमल को वित्त की जानकारी अच्छी थी . वे अकबर के वित्त मंत्री भी रहे थे . भूमि पैमाइश की वर्तमान प्रणाली राजा टोडरमल की हीं देन है .

कायस्थ लोग ईमानदार व शांत चित्त वाले लोग होते हैं .ये झुण्ड में रहना पसंद नहीं करते . किसी किसी गांव या मोहल्ले में इनके एक या दो घर हीं होते हैं. ऐसा इनकी सीमित जनसंख्या की वजह से भी हो सकता है. ये अपने में मगन रहने वाले लोग होते हैं. इनका कहना है -” झुण्ड में तो भेड़ व बकरियां रहती हैं . कायस्थ शेर होते हैं . इसलिए अकेला रहते हैं.” इतनी सारी बड़ाई के बावजूद कुछ बुराई कर ली जाय तो उम्मीद करता हूं कायस्थ विरादरी बुरा नहीं मानेगी . शराब के साथ कायस्थों का सम्बंध चोली दामन जैसा है . कहते हैं कि कभी पुत्र जन्म के बाद कायस्थों में बच्चे की जिह्वा पर शहद की जगह ब्राडेंड शराब टपकायी जाती थी .सुप्रसिद्ध हालावादी कायस्थ कवि हरिवंश राय बच्चन ने इस बात को सहर्ष हीं स्वीकार भी किया है –

मैं कायस्थ कुलोद्भव , मेरे पुरखों ने इतना ढाला .
मेरे तन के लहु में है पच्चहत्तर प्रतिशत हाला .
पुश्तैनी अधिकार मुझे है, मदिरालय के आंगन पर,
मेरे दादा ,परदादा के हाथ विकी थी मधुशाला .

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