जननेता प्रो. नवल किशोर यादव को भाजपा क्यों नहीं कर रही आगे ?

जननेता प्रो. नवल किशोर यादव को भाजपा क्यों नहीं कर रही आगे ?


बिहार की सियासत में प्रो.नवल किशोर यादव मंझे खिलाड़ी
• स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों के 25 वर्षों से प्रिय नेता है प्रो. नवल
• जाति के साथ जमात के भी नेता है प्रो.नवल किशोर यादव
• नमो की तारीफ करने की वजह से राजद से हुए थे बाहर
• अपने हजारों समर्थकों के साथ भाजपा में हो गए थे शामिल
• कभी भी पार्टी पर पद और प्रतिष्ठा के लिए दबाव नहीं बनाया
• फिर क्यों भाजपा इनकी ईमानदारी को लगातार कर रही है कूंद
• पक्ष-विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर रखते हैं बराबर की पकड़
• शिक्षकों के हक-हकूक की लड़ाई के लिए रहते हैं चर्चा में
• इनकी छवि को भाजपा को भूनाने की है जरुरत
• 16 फीसदी यादवों के वोट में बड़ा सेंध लगाने की ताकत रखते हैं प्रो.यादव
• सरकारी और गैरसरकारी शिक्षकों के एक मात्र हैं विश्वासी नेता प्रो.यादव

बिहार की सियासत का मंझा खिलाड़ी, जिसने लालू के तेवर को भी भाव नहीं दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यशैली की तारीफ क्या की, राजद से नाता टूट गया। अपने पुराने रिश्तों को ताख पर रखकर आगे बढ़ गए। इनकी बस एक ही पहचान है की जो सही है उसको सही कहो, राजनीति को पेशा नहीं बल्कि सेवा समझकर कदम बढ़ाया जाए।
तल्ख तेवर से भाजपा को क्यों परहेजः
राजद के विधान पार्षद नवल किशोर यादव पिछले 7 साल पहले अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा प्रदेश कार्यालय में सदस्यता ग्रहण करने के बाद उन्होंने कहा कि पार्टी का जो भी आदेश होगा, उसका अंतिम दम तक पालन करूंगा। अपनी उस बात पर आज भी अडिग हैं। बिना लाग लपेट के तल्ख जवाब से पार्टी की हर बात को रखने वाले प्रो.यादव की मुरीद रीजनल से लेकर नेशनल चैनल तक हैं और तो और आज की ताऱीख में न्यूज पोर्टलों की पहली पसंद बन गए हैं। वे कई दिनों से राजद से निलंबित थे। जिस उम्र में लोग राजनीति में आने की बात सोचते हैं उस उम्र में प्रो. नवल किशोर यादव पांचवीं बार सदन में जीतकर पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से दस्तक देते आ रहे हैं।
प्रो.नवल किशोर यादव को पाटलीपुत्र लोकसभा से लोकसभा प्रत्याशी बनाने की चर्चा थी, मगर उनको वो जगह नहीं दी गई। इसके बावजूद भी प्रो.नवल ने कभी पार्टी के गाइड लाइन से इधर उधर नहीं किया। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस पर अभी बात नहीं हुई है। पार्टी का जो भी आदेश होगा, वैसा करूंगा।
बिहार भाजपा जमीनी स्तर पर सिफरः
भाजपा अपने सधे कदमों से चलते हुए देश की सियासत में कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए काबिज हो गई। देश के ज्यादातर राज्यों में अपनी कार्यशैली की वजह से सरकार बनाने में सफल रही है। बिहार की राजनीति की बात करें तो यहां जदयू के साथ मिलकर सरकार चलाने वाली भाजपा अब नीतीश कुमार के बाद की बिहार की सियासत को साधने वाली है। इस बार की बनी बिहार सरकार में सुशील मोदी को पटना से दिल्ली भेजकर जो कदम उठाया वो बात तो समझ में आ रही है। मगर यहां की सियासत में उड़न खटोले से आने वाले भूपेंद्र यादव और केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय जिनकी जमीनी स्तर पर कोई बिसात नहीं है वही राजनीतिक सतरंज की गोटी बिछा रहे हैं। इस खेल में किसको कब आगे करना है इस बात को भूलकर अपने पीछे लगे लोगों को आगे कर रहे हैं। मगर भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व को जमीनी स्तर पर आकलन करना होगा, क्योंकि बिहार की सियासत में 16 फीसदी यादव को तोड़कर ही कुछ संभव हो पाएगा। भूपेंद्र और नित्यानंद दोनों ही यादव बिरादरी से आते हैं, पर इनका जाति पर अपना कोई प्रभाव नहीं है।
आंकड़ों के मजे हुए खिलाड़ी हैं प्रो.नवल किशोर यादवः
प्रो.नवल किशोर यादव, राजद में आधे से अधिक विधायकों और कार्यकर्ताओं पर अपनी धमक तो रखते ही हैं। जातिगत आंकड़ों के मजे हुए खिलाड़ी हैं। साथ ही बिहार में शिक्षक की राजनीति करने की वजह से शिक्षकों के चहेते प्रो.यादव के पास बिहार के 6 लाख से ज्यादा शिक्षकों का परिवार इनके साथ है। इस लिहाज से देखी जाए तो बिहार के हर कोने में प्रो.नवल किशोर यादव की अपनी अलग पैठ है। प्रो. यादव को बस इतना तक ही नहीं मानना है बल्कि इनका जाति और धर्म से अलग भी पूरे बिहार में अच्छी पकड़ है। यह एक जननेता के तौर पर अपनी पहचान कायम किए हुए हैं। जबकि प्राइवेट कॉलेजों के शिक्षकों और कर्मचारियों का एक बड़ा कुनबा इनके साथ है।
कटघरे में खड़ी बिहार भाजपाः
बिहार में एनडीए की 15 वर्षों से ज्यादा से सरकार है। पिछले 25 वर्षों से लगातार प्रो.नवल किशोर यादव विधायक हैं। कभी मंत्री या किसी अन्य पद की लालसा पार्टी में नहीं व्यक्त किया। जब पार्टी इस बार नया प्रयोग कर रही है तो प्रो.नवल किशोर यादव जिनका इतना बड़ा क्षेत्र पहले से विकसित है तो आखिर आगे क्यों नहीं किया और इनको मंत्री का नहीं बनाया जाना भाजपा नेतृत्व को ही कटघड़े में खड़ा करती है। अगर इस तरह से ऐसे नेताओं को पार्टी दरकिनार करती रही तो आगे सियासत भाजपा के लिए महंगी पड़ सकती है और अपने लक्ष्य से भाजपा पूरी तरह से भटक जाएगी।

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