गरीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर युवा उद्यमी बने कुमार गौरव उर्फ गौरव सिन्हा

गरीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर युवा उद्यमी बने कुमार गौरव उर्फ गौरव सिन्हा

कोरोना में मॉस्क का करें उपयोग, सरकार की गाइडलाइन का करें पालनः कुमार गौरव

  • *अपनी गरीबी से प्रेरणा लेकर 5 हजार से ज्यादा लोगों को दिला चुके हैं आशियाना*
  • *5 हजार से ज्यादा पेड़ लगा चुके गौरव अभी 10 हजार और पेड़ लगाएंगे*
  • *अपने पिता और बड़े भाई को आदर्श मानकर व्यवसाय को दे रहे हैं ऊंची उड़ान*
  • *गरीबों के मसीहा के रुप में पहचान बना चुके हैं कुमार गौरव और गौतम कुमार*
  • *रोजमर्रा के कामगारों के अपने आशियाने की राह को आसान किस्तों पर बनाया सुलभ*

“*मुझे याद है अपना बचपन, होली को रंगीन बनाने के लिए मेरे पिता जी एक साल पहले ही एक छोटा सा बकरे का बच्चा खरीद लाते थे। उसे खिलाते-पिलाते जब बड़ा होता था, तो सोचते थे कि इस बार होली बेहतर तरीके से कटेगी। मगर इस बाल मन को क्या पता कि उस बड़े से बकरे को पिता जी ले जाकर बाजार में बेंच आते थे और उससे जो पैसा मिलता था घर की जरुरतें पूरी होती थी। होली के लिए मेरी पिचकारी और अबीर के साथ घर में कुछ सामान की खरीदारी भी हो जाती थी। पर, कभी गोस्त का एक टूकड़ा भी नसीब नहीं होता था कुमार गौरव*”

“गरीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर विकसित व्यवसायी तक का सफर कुमार गौरव उर्फ गौरव सिन्हा ने तय किया। इस सफर में कठिन राहों से गुजरनी पड़ी। इनके पारिवारिक सफर की हकीकत हर किसी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।”

कुमार गौरव की सफलता की कहानी लाजवाब है। उन्होंने तरुणाई अवस्था में अपने बड़े भाई के साथ मिलकर आजीविका चलाने के लिए संघर्ष किया। एक समय खाना बढ़िया से नसीब नहीं होता था। हलांकि माता-पिता को इस बात का मलाल हमेशा बना रहा। मगर करें तो भी क्या, किसी धंधे को शुरु करने के लिए इनको आर्थिक सहयोग की जो जरुरत थी। पर, वो भी बड़ी मुश्किल थी। पढ़ाई करके किसी तरह से छोटी सी भी नौकरी मिल जाए ताकि परिवार दो जून की रोटी इज्जत के साथ खा सके। मगर यहां तो पिता के सानिध्य में दोनों भाईयों को एक नई इबारत जो लिखनी थी, इनलोगों ने ऐसी मिसाल खड़ी की, कि जो खुद कई रात भूखे सो जाते थे, वही आज कितनी घरों के चूल्हे जलाते हैं।

*संघर्ष में साहस बरकरारः*

रोटी-कपड़ा और मकान हर किसी की जरुरत होती है। हर कोई अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहता है। मगर कुछ लोगों की चाहतें मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। कुछ ऐसा ही युवा उद्यमी कुमार गौरव के साथ भी, इनके पिता अशोक कुमार लाल झारखंड के खूँटी में छोटे-मोटे ठेकेदारी का काम किया करते थे। किसी तरह परिवार का भरण पोषण हो जाया करता था। मगर एक दिन ऐसा भी आया की सारे काम-धंधे ठप्प पड़ गए। घर में शुरु हो गई संघर्ष की कहानी, एक तरफ बच्चों की पढ़ाई तो दूसरी तरफ घर चलाने की जिम्मेवारी ने अशोक बाबू के टूटते सपनों का सबब बन गया। इस बात को उनके बेटों ने बाखूबी समझा। कुमार गौरव अपने बड़े भाई कुमार गौतम के साथ जहानाबाद के अपने गांव में ही अपनी कुछ जमीन से उपजायी गई सब्जियों और अनाज को सड़कों पर बेचने लगे। पर, जिन हाथों में कलम और किताब होना चाहिए थे उन हाथों से सब्जियां भी लोग औने-पौने भाव में लेकर निकल जाते थे। खैर, ये सिलसिला चलता रहा। एक दिन गौतम कुमार जहानाबाद से निकलकर गया आ गए और यहां पढ़ाई के साथ ही ट्यूशन पढ़ाने लगे। कुछ दिनों के बाद अपने पिता, छोटे भाई कुमार गौरव और बहन को भी अपने साथ लाए।

*लिख दी नई इबारतः*

कुमार गौरव अक्सर कहते हैं, ‘मैं गांधी जी की तरह जिंदगी जीता हूं। मैं जमीन पर सोता हूं।’ भारत में अमीरों और गरीबों के बीच गहरी खाई है। उन्होंने कहा, ‘ हम दोनों भाईयों ने जब लोगों को सड़कों के किनार सोते देखा तो सोच लिया कि ऐसा काम करुंगा कि हर किसी के पास अपना आशियाना होगा। चुंकि संघर्ष को बहुत करीब से समझने का मौका मिला था। दोनों भाई एक वक्त खाकर 11 घंटे पसीना बहाते थे। गरीबी का मतलब समझने की फिराक में लोगों से मिलते रहे। छोटे मोटे ठेकेदारी का काम करते करते एक दिन बिल्डर बन गए। मगर इनका संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ सोचने लगे यह क्या हो रहा है, इसका क्या उपाय है।’ वर्ष 2008 में अपनी सोच को जमीन पर उतारने के लिए भूस्वामी प्रॉपर्टीज एंड डेवलपर्स के नाम से एक कंपनी बनाई। इस कंपनी ने बहुत कम समय में पिता अशोक कुमार लाल के अनुभवों के साथ उनके ही नेतृत्व में बहुत आगे निकल गई।

वर्ष 2014 में पढ़ाई करने के दौरान ही कुमार गौरव ने भी अपनी ही कंपनी से जुड़कर भाई का हाथ बंटाने लगे। दरअसल कुमार गौरव के मन में अपने गुजरे दिनों की टिस आज भी जिंदा है। वो किसी को भी कष्ट पहुंचाना नहीं चाहते हैं। एक किराए के मकान में गुजारा करने वाले श्री कुमार ने अपने बीते दिनो को यादकर कदम को आगे बढ़ाया और संकल्प लिया कि हर किसी के पास अपना घर होगा। इस कल्पना को मूर्त रुप देने के लिए भाई के साथ दिन रात मेहनत करने लगे। नतीजा हुआ कि झुग्गी झोपड़ी और रोज कमाने खाने वाले जो सड़कों पर रात किसी तरह रात गुजराते थे उनके लिए किस्तों पर बिना मुनाफे के जमीन उपलब्ध कराना शुरु कर दिया। आज की तारीख में 5 हजार से ज्यादा लोगों के पास अपना जमीन उपलब्ध करा चुके हैं। आगे भी इस काम को जारी रखते हुए गया से बाहर भी लोगों के दर्द को साझा कर उन्हें अपना घर मुहैया हो इसके लिए काम कर रहे हैं।

*पर्यावरण के प्रति समर्पणः*

जिंदगी में सब्जियां बेंचने के क्रम में हरियाली से ऐसा लगाव हुई कि कुमार गौरव ने उसी दौरान एक संकल्प ले लिया, कि जब भी किसी के लिए जमीन या अपार्टमेंट मुहैया कराउंगा तो वहां हरियाली का पहले ध्यान रखूंगा। सभी लोगों से वृक्षारोपण के लिए अपील भी करते रहते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जल-जीवन-हरियाली अभियान से इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने 10 हजार पेड़ लगाने का फैसला ले लिया है। हलांकि श्री गौरव और इनका पूरा परिवार ग्रिनरी से इतने जुड़े हुए हैं कि अब तक लगभग 5 हजार से अधिक पेड़-पौधे लगा चुके हैं और निरंतर उसकी रखवाली भी करते हैं।

गया जिसे मोक्ष की भूमि कही जाती है। इस भूमि पर 500 ई0 पूर्व गौतम बुद्ध ने फल्गु नदी के तट पर बोधि वृक्ष के नीचे दिन-रात तपस्या की थी, उसके बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। ठीक उसी तरह कुमार गौरव और इनके परिवार के लोगों ने बुद्ध की तपस्या में लिनता से सीख लेकर अपनी व्यवसायिक तपस्या में लग गए। हमेशा परोपकार की भावना रखने की वजह से यह मगध क्षेत्र के एक बड़े उद्यमी बन गए हैं। इन्होंने कभी बाहर की ओर प्रस्थान नहीं किया। बल्कि अपनों के बीच रहकर संघर्ष करते हुए अपनों का विकास कर रहे हैं। अक्सर गालिब के शेर – ‘मेरे बारे में कोई राय मत बनाना गालिब, मेरा वक्त भी बदलेगा, तेरी राय भी…..’ कहते रहते हैं।

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